मंगलवार, 13 अगस्त 2024

                            कुछ तो हवा भी सर्द थी कुछ था तिरा ख़याल भी

दिल को ख़ुशी के साथ साथ होता रहा मलाल भी

बात वो आधी रात की रात वो पूरे चाँद की

चाँद भी ऐन चैत का उस पे तिरा जमाल भी

सब से नज़र बचा के वो मुझ को कुछ ऐसे देखता

एक दफ़ा तो रुक गई गर्दिश-ए-माह-ओ-साल भी

दिल तो चमक सकेगा क्या फिर भी तराश के देख लें

शीशा-गिरान-ए-शहर के हाथ का ये कमाल भी

उस को पा सके थे जब दिल का अजीब हाल था

अब जो पलट के देखिए बात थी कुछ मुहाल भी

मेरी तलब था एक शख़्स वो जो नहीं मिला तो फिर

हाथ दुआ से यूँ गिरा भूल गया सवाल भी

उस की सुख़न-तराज़ियाँ मेरे लिए भी ढाल थीं

उस की हँसी में छुप गया अपने ग़मों का हाल भी